दो किनारें (Two Seashores)

हवा गुंज रही है ऐसे,
गुनगुना रही है कुछ पंक्तियाँ।
फैल रही है ऐसे,
कह रही है कुछ कहानियाँ।

किरणें उड़ रहे हैं ऐसे,
जैसे आखों ने किये हो इशारें।
इशारों पर नाचति आखें,
जैसे समुंदर के दो किनारें।

मत लिखना और नाम इस रेत पर,
खींचति है वह लहरे किनारे।
मिटते नहि यह नाम पल भर,
जब तक किनारे ना भीग जाये पूरे।

छा गये बादल काले काले से,
तेज़ हवा है भीगि भीगि।
बिजली गरजति है तोड के,
लहरें बनती है ऊँचि ऊँचि।

गिरती बूंदों के धार से,
भीगते है किनारे, भीगता है नज़ारा।
एक एक कण भीगि रेत कि,
मांगती है एक हाथ का सहारा।

आसमाँ उजला, किनारे उजले,
उगते सूरज के किरणों से।
चम चमाते दो मोति उगले,
तितली के पंखों जैसे।

हवा गुंज रही है ऐसे,
गुनगुना रही है कुछ नयी पंक्तियाँ।
फैल रही है ऐसे,
कह रही है कुछ नयी कहानियाँ।